शिक्षा को कमोडिटी बनाओगे तो गलगोटियास से कैसे बचोगे?

NFA@0298
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भारत में शिक्षा को कमोडिटी बना दिया गया है, इसकी  झलक दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित  इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट में दुनिया भर ने देखी और थू थू किया। एक घटना ने पूरे देश को हिला दिया। गलगोटियास यूनिवर्सिटी  ने अपने स्टॉल पर एक रोबोटिक डॉग  ‘ओरियन’ को प्रदर्शित किया था और दावा किया कि यह उनके सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में विकसित किया गया है।

लेकिन जल्द ही सोशल मीडिया और जांचकर्ताओं ने खुलासा कर दिया कि यह  एक चीनी कंपनी का  मॉडल है, जो बाजार में लगभग दो ढाई  लाख रुपये में उपलब्ध है। गलगोटियस की  प्रोफेसर नेहा सिंह ने दूरदर्शन  को दिए इंटरव्यू में इसे इन-हाउस इनोवेशन बताया, जिसके बाद यूनिवर्सिटी को स्टॉल खाली करने को कहा गया। यूनिवर्सिटी ने बाद में माफी मांगी, कहा कि  कोई गलत इरादा नहीं था, लेकिन नुकसान हो चुका था।

बात एक यूनिवर्सिटी की शर्मिंदगी नहीं थी।  यह भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था की गहरी बीमारी का आईना बन गई।  दावे बड़े बड़े, लेकिन जमीन पर कुछ ख़ास नहीं।  असल में नवाचार की कमी, इमेज बिल्डिंग पर जोर और शिक्षा को कमोडिटी बनाने की प्रवृत्ति साफ दिखती है। यह बहाना बन गया उन सवालों का, जो दशकों से अनसुने हैं: भारत शिक्षा पर कितना खर्च करता है? उच्च शिक्षा पर कितना? विश्व-स्तरीय विश्वविद्यालय क्यों नहीं बन पाते? निजी यूनिवर्सिटीज केवल डिग्री की दुकानें बन गई हैं क्या? 

भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, लेकिन शिक्षा पर सार्वजनिक खर्च अभी भी निराशाजनक है। विश्व बैंक और यूनेस्को के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, 2022 में भारत ने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 4.1% शिक्षा पर खर्च किया। यह आंकड़ा 2015-2024 के बीच 4.1% से 4.6% के बीच रहा है। सन  2020 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने स्पष्ट रूप से 6% जीडीपी  शिक्षा पर खर्च करने का लक्ष्य रखा है, लेकिन हम अभी भी उससे काफी पीछे हैं।

केंद्र और राज्यों के कुल बजट में शिक्षा का हिस्सा अक्सर 2.2% से 2.7% जीडीपी  के बीच रहता है।  उदाहरण के लिए, 2025-26 के यूनियन बजट में शिक्षा के लिए 1.28 लाख करोड़ रुपये  आवंटित किए गए, जो पिछले साल से 6.5% अधिक है, लेकिन यह कुल जीडीपी का छोटा सा हिस्सा है।

उच्च शिक्षा पर खर्च और भी कम है। कुल शिक्षा बजट का बड़ा हिस्सा स्कूल शिक्षा पर जाता है, जबकि उच्च शिक्षा (कॉलेज, यूनिवर्सिटी, रिसर्च) पर उस राशि का मात्र 20-25% रह जाता है। 2015 में उच्च शिक्षा बजट 26,855 करोड़ था, जो 2025 में ₹50,078 करोड़ हो गया—दोगुना से थोड़ा अधिक, लेकिन महंगाई और छात्र संख्या की वृद्धि को देखते हुए अपर्याप्त। तुलना करें तो चीन और रूस जीडीपी  का 4%, ब्राजील 5.6% और दक्षिण अफ्रीका 6% शिक्षा पर खर्च करते हैं। भारत ब्रिक्स देशों  में सबसे पीछे है।

कम खर्च मतलब पुरानी लैब्स, कम फैकल्टी, रिसर्च फंडिंग की कमी। कुछ  संस्थान अपवाद हैं, लेकिन अधिकांश राज्य यूनिवर्सिटी और प्राइवेट कॉलेज संघर्ष करते हैं।

1980-90 में फंडिंग घटी, प्राइवेट प्लेयर्स आए। यूनेस्को की रिपोर्ट के मुताबिक भारत सरकार रिसर्च पर जीडीपी  का मात्र 0.7% खर्च करती है, जबकि अमेरिका में 3%+ और चीन में प्राइवेट सेक्टर का बड़ा योगदान है। भारत में रिसर्च ज्यादातर सरकारी है, प्राइवेट यूनिवर्सिटी में फैकल्टी को पूरी तनख्वाह ही नहीं मिलती तो वे रिसर्च पर क्या ख़ाक रूपया खर्च करेंगे?

अनेक प्राइवेट विश्वविद्यालय  भ्रष्टाचार और राजनीतिक प्रभाव से ग्रस्त हैं। कई तो  नेताओं द्वारा संचालित हैं या उनकी कमाई का रंग बदलने, यानी काला सफ़ेद करने के लिए खोले गए हैं।  प्राइवेट यूनिवर्सिटीज राज्य के कानूनों से बनती हैं, लेकिन केंद्रीय स्तर पर कोई मजबूत फ्रेमवर्क नहीं। नई शिक्षा नीति 2020 में सुधार की बात है, लेकिन अमल धीमा है।

भारतीय यूनिवर्सिटीज टीचिंग पर फोकस करती हैं, रिसर्च नहीं। फैकल्टी को प्रमोशन के लिए पेपर पब्लिश करने पड़ते हैं, लेकिन क्वालिटी कम। प्राइवेट में प्रॉफिट पहले, रिसर्च बाद में।हमारे बेस्ट स्टूडेंट्स विदेश जाते हैं। आईआईटी या एनआईटी से निकलकर वे विदेश भाग में जाते हैं, भारत में नहीं रहते। 

1990 के बाद प्राइवेटाइजेशन से उच्च शिक्षा में पहुंच बढ़ी—जीएएआर यानी ग्रॉस एनरोलमेंट रेशो   27%+ हो गया। लेकिन कई निजी यूनिवर्सिटीज डिग्री फैक्टरियां बन गईं। फीस ऊंची, प्लेसमेंट झूठे, इंफ्रास्ट्रक्चर औसत।गलगोटियास का मामला चरम है।  उसने एआई  में करोड़ों निवेश का दावा किया, लेकिन चीनी रोबोट को अपना बताया। 

पहले भी उस पर कई आरोप लगे हैं जैसे 1.5 करोड़ पैकेज का फर्जी प्लेसमेंट, छात्रों को राजनीतिक रैली में इस्तेमाल। कई प्राइवेट यूनिवर्सिटीज रैंकिंग, मार्केटिंग और फीस पर फोकस करती हैं, न कि शिक्षा पर।केवल कुछ संस्थान रिसर्च में अच्छा कर रहे हैं। समस्या सिस्टमिक है -प्रॉफिट मोटिव बिना रेगुलेशन के।

सुधार के रास्ते भी हैं।  उच्च शिक्षा पर अलग फोकस करना चाहिए और रिसर्च फंड बढ़ाना चाहिये। अच्छे संस्थानों को ज्यादा फ्रीडम मिले और  खराबों पर सख्ती। रिसर्च कल्चर के लिए  फैकल्टी को इंसेंटिव मिलाना चाहिए और इंडस्ट्री पार्टनरशिप को प्रमोट करना चाहिए। 

प्राइवेट सेक्टर  पर सख्ती से रेगुलेशन हो।  फीस कैप, क्वालिटी चेक, प्रॉफिट उपयोग पर नियम बने। विदेशी  ग्लोबल यूनिवर्सिटीज को भारत में कैंपस खोलने की इजाजत देना चाहिए।  देश गलगोटियास कांड भूल जाएगा, लेकिन सबक नहीं भूलना चाहिए। 



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