बालेन ने वही सीढ़ी तोड़ दी जिस पर चढ़कर शीर्ष पर पहुंचे

NFA@0298
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नेपाल में नई सरकार के गठन के साथ ही दो बड़े कदम उठाए गए हैं। छात्र राजनीति पर पूर्ण प्रतिबंध और पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की गिरफ्तारी। ये दोनों घटनाएं नए प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह (बालेन) के इशारे पर हो रही हैं, जो खुद छात्र आंदोलन और युवा विद्रोह से राजनीतिक मुख्यधारा में आए थे। यह विरोधाभास केवल सतही नहीं है, बल्कि नेपाल के संसदीय लोकतंत्र की गहराई में उतरता हुआ सवाल उठाता है कि क्या सत्ता में आने के बाद सुधारक भी वही पुरानी राह अपनाने लगते हैं, जिसकी आलोचना उन्होंने स्वयं की थी?

बालेन शाह की छवि युवा, ईमानदार और परिवर्तनकारी नेता की रही है। काठमांडू महानगरपालिका के मेयर के रूप में उन्होंने भ्रष्टाचार पर प्रहार, सड़क सुधार और नागरिक सुविधाओं में नई जान फूंकी। उनके समर्थक उन्हें ‘बालेन क्रांति’ का प्रतीक मानते हैं। लेकिन सत्ता संभालते ही छात्र संगठनों पर पाबंदी और पूर्व प्रधानमंत्री की गिरफ्तारी जैसे कदम उनके लोकतांत्रिक चरित्र पर सवालिया निशान लगा रहे हैं।

छात्र राजनीति को दबाना केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं है। यह युवाओं की आवाज को कुचलने का संकेत है। पूर्व प्रधानमंत्री की गिरफ्तारी को अगर भ्रष्टाचार या गैरकानूनी गतिविधियों से जोड़ा जाए तो अलग बात है, लेकिन अगर यह राजनीतिक बदला या सत्ता का दुरुपयोग लगे तो यह दक्षिण एशिया में चल रही ‘प्रतिशोध की राजनीति’ का ही हिस्सा बन जाता है। जहां पाकिस्तान में नवाज़ शरीफ़ और इमरान खान की सत्ता परिवर्तन से लेकर जेल जाने तक और बांग्लादेश में शेख हसीना के निर्वासन की घटना हो चुकी है।

नेपाल की अपनी जटिलताएं हैं। बेरोजगारी की दर ऊंची है, युवा विदेश पलायन कर रहे हैं। गरीबी और असमानता ने समाज को दो हिस्सों में बांट रखा है। साथ ही, राजशाही की वापसी चाहने वाली शक्तियां अभी भी सक्रिय हैं। बालेन स्वयं हिंदूवादी विचारधारा से प्रभावित माने जाते हैं। ऐसे में संसदीय लोकतंत्र को बचाए रखना आसान नहीं। लेकिन छात्र राजनीति को प्रतिबंधित कर बालेन ने वही गलती दोहराई है जो अतीत में राजतंत्र और विभिन्न दलों ने की थी।

बालेन शाह के पास एक अनोखा अवसर है। वे युवा हैं, टेक्नोक्रेट हैं और जनता का विश्वास उनके पास है। वे भ्रष्टाचार, भूकंप पुनर्निर्माण और रोजगार सृजन जैसे मुद्दों पर ठोस कदम उठा सकते हैं। लेकिन लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए उन्हें विपक्ष को जगह देनी होगी, छात्र संगठनों को संवाद का माध्यम बनाना होगा और न्याय को राजनीति से अलग रखना होगा।

सत्ता का पहला सबक यही होता है कि लोकतंत्र केवल बहुमत का नाम नहीं, बल्कि अल्पमत की सुरक्षा का भी नाम है। ऐसे में भारत की भूमिका महत्‍वपूर्ण हो जाती है कि वह अपने पड़ोस में घट रही इस घटनाओं पर
सकारात्‍मक पहल करे और खुद भी ऐसे उदाहरण पेश करे जो पड़ोसियों के लिए मिसाल बने।



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