

वाशिंगटन/तेहरान, 27 मार्च। पश्चिम एशिया में अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच हालात बेहद नाजुक बने हुए हैं। एक ओर जहां कूटनीतिक स्तर पर बातचीत के संकेत मिल रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ दोनों देशों की सैन्य तैयारियां संभावित बड़े टकराव की आशंका को और गहरा रही हैं। वहीं दूसरी ओर शुक्रवार को ईरान ने कुवैत के व्यवसायिक बंदरगाह शुवैख पर ड्रोनों ने हमला किया। इससे संपत्ति को नुकसान पहुंचा, लेकिन किसी के हताहत होने की खबर नहीं है।
चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ और तुर्किए की संवाद समिति अनाडोलू के अनुसार कुवैत पोर्ट्स अथॉरिटी ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर बताया कि ईरान के ड्रोन हमले से शुवैख बंदरगाह की सुविधाओं को नुकसान पहुंचा है और अब तक किसी के घायल होने की कोई रिपोर्ट नहीं मिली है।
इधर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बड़ा फैसला लेते हुए ईरान के ऊर्जा संयंत्रों पर हमले की योजना को 6 अप्रैल तक के लिए टाल दिया है। उन्होंने यह घोषणा अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर करते हुए कहा कि ईरानी सरकार के अनुरोध पर इस रोक को 10 दिनों के लिए बढ़ाया गया है। इससे पहले भी अमेरिका पांच दिनों के लिए हमले पर रोक लगा चुका था, जिसकी अवधि अब और बढ़ा दी गई है।
ट्रम्प ने दावा किया कि दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है और यह ‘काफी अच्छी दिशा में’ आगे बढ़ रही है, हालांकि ईरान ने सार्वजनिक रूप से किसी औपचारिक वार्ता से इनकार किया है। ट्रम्प के अनुसार, ईरान ने सद्भावना के तौर पर कुछ तेल टैंकरों को होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति दी, जिसे उन्होंने सकारात्मक संकेत बताया।
इस बीच, पाकिस्तान, तुर्किये और मिस्र जैसे देश इस तनाव को कम करने के लिए मध्यस्थता की कोशिशों में जुटे हैं। पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने पुष्टि की है कि इस्लामाबाद दोनों पक्षों के बीच संदेश पहुंचाने का काम कर रहा है, ताकि हालात को काबू में लाया जा सके।
हालांकि कूटनीतिक प्रयासों के समानांतर जमीनी हकीकत कहीं ज्यादा चिंताजनक नजर आ रही है। ईरान ने संभावित जमीनी युद्ध की आशंका को देखते हुए अपनी सैन्य तैयारियां तेज कर दी हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने 10 लाख से अधिक सैनिकों की तैयारी का दावा किया है। देश में युवाओं के बीच सेना, रिवोल्यूशनरी गार्ड और ‘बसीज’ फोर्स में शामिल होने की होड़ मची हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान अपनी जमीनी ताकत को मजबूत कर अमेरिका को यह संदेश देना चाहता है कि उसकी धरती पर हमला करना आसान नहीं होगा।
दूसरी ओर, अमेरिका भी अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ाने की तैयारी में है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी रक्षा विभाग मिडिल ईस्ट में करीब 10,000 अतिरिक्त सैनिक भेजने पर विचार कर रहा है। यह टुकड़ी पहले से तैनात हजारों मरीन और पैराट्रूपर्स के साथ मिलकर क्षेत्र में अमेरिकी ताकत को और मजबूत करेगी।
इन घटनाक्रमों के बीच स्थिति विरोधाभासी बनी हुई है-एक तरफ बातचीत और हमले टालने जैसे कदम हैं, तो दूसरी तरफ भारी सैन्य जमावड़ा।
विश्लेषकों का कहना है कि यह ‘रणनीतिक दबाव और कूटनीति’ का मिश्रण है, जिसमें दोनों पक्ष एक-दूसरे पर बढ़त बनाने की कोशिश कर रहे हैं, बिना सीधे युद्ध में उतरे।
फिलहाल, दुनिया की नजरें 6 अप्रैल की समयसीमा पर टिकी हैं। अगर तब तक कोई ठोस समझौता नहीं होता, तो यह तनाव एक बड़े सैन्य संघर्ष में बदल सकता है, जिसका असर वैश्विक शांति और अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ेगा।


