क्या Bastar बन गया ईसाई विरोध की प्रयोगशाला?

NFA@0298
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रायपुर। ‘भारतीय संविधान के आर्टिकल 25 के तहत मिले धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार आज खतरे में है। इसे कुचलने की कोशिश की जा रही है।’

इन लाइनों को देशभर में हाल ही में हुई कुछ घटनाएं सही ठहरा रहीं हैं। खासकर छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में जहां, कब्र में दफन शव को निकाल लिया जा रहा है और प्रशासन मूक बना हुआ है।

हाल की कुछ घटनाओं से यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या बस्तर को ईसाई विरोध की नई प्रयोगशाला बना दी गई है?

महीनेभर पहले कांकेर के आमाबेड़ा में इस तरह एक शव को निकाल लिया गया। पीडित परिवार की तरफ से विरोध करने के बाद जमकर बवाल मचा था। उपद्रव करने वालों ने चर्च और घरों में आग लगा दी थी।

पीड़ितों से घटना के बारे में पूरी जानकारी जुटाता मूल निवासी संघ का प्रतिनिधिमंडल।

मूल निवासी संघ का एक प्रतिनिधि मंडल उन्हीं पीडितो से मिलने जा रहा था, लेकिन प्रशासन ने कानून व्यवस्था का हवाला देकर उन्हें वहां जाने नहीं दिया। बल्कि पीड़ितों को कांकेर बुलाकर उनसे मुलाकात कराई। कांकेर में ही डेलीगेट ने पीड़ितों से मुलाकात कर पूरे घटनाक्रम की विस्तृत जानकारी ली। इस मुलाकात के बाद आमाबेड़ा घटना को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है।  

इस पूरे खुलासे पर पढ़े द लेंस की यह रिपोर्ट

मसीही समाज के पीड़ितों से मुलाकात के बाद मूल निवासी संघ ने प्रशासन की भूमिका और घटना की सच्चाई को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

प्रतिनिधिमंडल और पीड़ितों की बैठक के बाद यह खुलासा हुआ कि जिस शव को गांव के लोगों ने कथित तौर पर बाहरी तत्वों के साथ मिलकर कब्र से निकाला था, उसका अंतिम संस्कार मसीही रीति-रिवाज से नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की परंपरागत रीति-रिवाजों के अनुसार किया गया।

राजमन सलाम, पीड़ित सरपंच

यह आरोप किसी और ने नहीं, बल्कि खुद पीड़ित सरपंच राजमन सलाम ने लगाया है। राजमन सलाम ने द लेंस से बातचीत में कहा कि यह पूरी घटना अमानवीय है। उनके माता पिता आदिवासी समाज में ही थे। हम चार भाइयों में तीन भाई ही मसीही समाज पर आस्था रखते हैं। बड़ा भाई अब भी आदिवासी समाज के रीति रिवाजों को ही मानता है। इस वजह से पिताजी का अंतिम संस्कार आदिवासी रीति रिवाजों के अनुसार मेरे बड़े भाई ने किया है।

राजमन आगे कहते हैं कि गांव की राजनीतिक लड़ाई को सामाजिक रंग देने की कोशिश की गई। जिन दो लोगों ने पूरे विवाद को बढ़ाया, उन्हें सरपंच चुनाव में मुझसे हार मिली थी। अब पिता की मौत के बाद इस तरह उन्होंने हार का बदला लेने की कोशिश की है।

राजमन ने बताया कि मैं और मेरे दो भाई कई वर्षों से मसीही समाज के प्रति आस्था रख रहे हैं। लेकिन, गांव के लोगों को कभी भी कोई दिक्कत नहीं हुई। अब जब चुनाव में मुझे जीत मिली तो मेरे विरोधी इसे धार्मिक मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

प्रतिनिधि मंडल ने केवल आमाबेड़ा ही नहीं, बल्कि अन्य गांवों के पीड़ितों से भी मुलाकात की, जिनके साथ कब्र से शव निकाले जाने, धार्मिक भावनाएं आहत करने का काम हुआ है। पीड़ितों ने आरोप लगाया कि कानून के खिलाफ जाकर हम पर हमला करने वालों के खिलाफ प्रशासन की तरफ से कोई कार्रवाई नहीं की बल्कि प्रशासन ने ऐसा करने वालों का साथ दिया।

पति के शव को ले गया प्रशासन लेकिन कहां है अब तक पता नहीं

कुंवर वती राठौर, पीड़ित महिला

कांकेर के जामगांव में भी शव निकालने की घटना हुई। जामगांव में रहने वाली महिला कुंवर वती राठौर के पति की मौत हो गई थी। अस्पताल में लंबे समय तक इलाज के बाद उनकी मौत हुई। कुंवर वती ने अपने जमीन पर उन्हें दफना दिया। जिस दिन दफनाया उस दिन तो कुछ नहीं किया। लेकिन, दूसरे दिन उन्होंने देखा कि पति की कब्र उजड़ी पड़ी और शव उस पर से निकाल लिया गया है।

कुंवर वती आगे कहती हैं कि उन्होंने जब पति के शव के गायब होने के बारे में पता किया तो प्रशासन की तरफ से कुछ लोग आए और एक कागज देकर कहने लगे, इसमें हस्ताक्षर कर दो। जब कुंवर वती ने कागज पढ़ा तो उसमें लिखा था कि उसने शव को दूसरी जगह दफनाने की अनुमति दी है।

महिला ने जब हस्ताक्षर करने से मना कर दिया तो पुलिस और प्रशासन की तरफ से हर कुछ दिनों में उनके पास चिट्‌ठी आती है। लेकिन, कोई यह बताने को तैयार नहीं कि उनके पति के शव के साथ क्या किया गया?

आंगनबाड़ी सहायिकाओं के पास नहीं भेज रहे बच्चे

Bastar
पीड़ित महिलाएं, जिन्हें मसीही समाज के रीति रिवाजों को मानने की वजह से अब गांव वाले परेशान कर रहे हैं।

कांकेर के ही दो अलग-अलग गांव की कहानियां भी सामने आईं। कांकेर के चरामा के एक गांव में एक आंगनबाड़ी में सहायिका हैं शांता मरकाम। शांता पिछले 8 वर्षों से भी ज्यादा समय से मसीही समाज के रीति रिवाजों को मान रहीं हैं, उन पर आस्था रख रहीं हैं। लेकिन, अक्टूबर 2025 के बाद से उन्हें गांव के लोग हिंदू धर्म मानने का दबाव बना रहे हैं।

शांता का कहना है कि अक्टूबर में गांव-गांव में सर्व समाज के लोगों की बैठक हुई थी। उसके बाद ही इस तरह का व्यवहार उनके साथ होने लगा। पहले कभी भी इस तरह का बर्ताव नहीं किया गया था।

शांता कहती हैं कि उन्हें गांव के लोगों ने कहा कि तुम्हारा हमारे धर्म में स्वागत है। हम तुमको अपना लेंगे, लेकिन तुम्हे मसीही समाज के प्रति अपनी आस्था छोड़नी होगी। तुम फिर से गांव के रीति रिवाज मानने लगो।

जब शांता ने कहा कि वह अपनी आस्था प्रभु यीशू पर रखती है तो गांव वालों ने कहा कि अगर वह अपनी आस्था यीशू पर रखेगी तो गांव वाले अपने बच्चे आंगनबाड़ी नहीं भेजेंगे।

इसी तरह कांकेर के ही भैंसमुड़ी गांव में केसर नरेटी के साथ बर्ताव हो रहा है। केसर भी आंगनबाड़ी सहायिका हैं और नवंबर 2025 से उन पर भी हिंदू और आदिवासी रीति रिवाजों को पालन करने का दबाव बनाया जा रहा है।

कांकेर में ईसाई कब्रिस्तान के लिए प्रशासन ने पहले जगह दी, फिर दफनाने में लगा दी रोक

मूल निवासी संघ के सुभाष चंद्र मेश्राम ने पीड़ितों से मुलाकात के बाद कहा कि कांकेर में ईसाई कब्रिस्तान के लिए प्रशासन ने जगह तय की थी। करीब डेढ़ एकड़ जगह आवंटित की थी। वहां तीन शवों  को दफन किया गया था, लेकिन फिर कट्‌टरपंथी और हिंदू वादी संगठनों के विरोध के बाद शव दफनाने पर प्रशासन ने रोक लगा दी।

कलेक्टर के नाम एसडीएम को ज्ञापन देने के बाद प्रतिनिधिमंडल।

मूल निवासी संघ के अमरजीत पटेल ने कहा कि यह केवल एक शव का मामला नहीं है, यह संविधान द्वारा दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार पर हमला है। ऐसा करना कानूनी अपराध है, लेकिन सरकार निजी स्वार्थ पूरा करने के लिए ऐसा करने वाले असामाजिक तत्वों को शह दे रही हैं।

मूल निवासी संघ ने सवाल उठाया कि इतनी गंभीर घटना के बावजूद अब तक दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई क्यों नहीं हुई। प्रतिनिधिमंडल ने कांकेर कलेक्टर के नाम SDM अरुण कुमार वर्मा को ज्ञापन सौंपते हुए मांग की कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो और कब्र से शव निकालने, धार्मिक अपमान और हिंसा में शामिल लोगों पर कड़ी कार्रवाई की जाए।

मूल निवासी संघ के ज्ञापन पर जब एसडीएम अरुण कुमार वर्मा से प्रशासन का पक्ष जानने की कोशिश की गई तो उन्होंने कहा कि यह बेहद ही संवेदनशील मुद्दा है। इस पर कुछ कहना सही नहीं होगा। हम इस कोशिश में है कि जो भी हालत बन रहे हैं, उसे नियंत्रित किया जाए। ताकि कानून व्यवस्था न बिगड़े।

इस संबंध में द लेंस की वीडियो रिपोर्ट देखें

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