एक ‘धुरंधर’ सवाल- क्या जनता पार्टी का प्रयोग आईएसआई का प्रोजेक्ट था?

NFA@0298
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इस शीर्षक को देखकर आप अगर चौंक रहे हैं और लिखने वाले को व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी से निकला पागल समझ रहे हैं तो आप बिल्कुल ठीक हैं। लेकिन बॉक्स ऑफ़िस पर धुआँधार कमाई कर रही फिल्म ‘धुरंधर’ के निर्देशक आदित्य धर के ‘स्कूल’ से निकले किसी फिल्मकार के लिए ऐसी फिल्म बनाना मुश्किल नहीं होगा जब केंद्र में बीजेपी की सरकार नहीं होगी। जिस तरह से ‘धुरंधर’ फिल्म में ‘व्हाट्सऐप ज्ञान’ को संदर्भहीन तथ्यों और सत्य-असत्य का घालमेल करके बीजेपी विरोधी दलों को विदेशी साजिश में शामिल बताया गया है, उसी तरह कांग्रेस को पहली बार केंद्र की सत्ता से बाहर करने वाली जनता पार्टी के प्रयोग को भी आईएसआई का प्रोजेक्ट बताया जा सकता है। पीएम मोदी को ‘महामानव’ और विपक्ष को ‘देशद्रोही’ बताने का नैरेटिव सेट करने के लिए बनायी गयी ‘धुरंधर’ इस लिहाज से एक खतरनाक शुरुआत है।

इंदिरा गांधी ने 1968 में रिसर्च एंड एनालिसिस विंग यानी रॉ की स्थापना की थी। यह विदेशी धरती पर खुफिया ऑपरेशन्स के जरिए भारतीय हितों की रक्षा करने वाली बेहद दक्ष खुफिया एजेंसी के रूप में जल्दी की प्रसिद्ध हो गयी। लेकिन जनता पार्टी के शासन में प्रधानमंत्री बने मोरारजी देसाई ने रॉ को कमजोर कर दिया। रॉ में काम कर चुके बी. रमन ने अपनी किताब ‘काव-ब्वायज़ ऑफ रॉ’ में कई चौंकाने वाले रहस्योद्घाटन किये हैं। रामनाथ काव रॉ के पहले डायरेक्टर थे और यह किताब रॉ को मजबूत करने में उनकी कल्पनाशीलता और पेशेवर दक्षता का बयान करती है। इसी से पता चलता है कि पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम का ब्ल्यूप्रिंट हासिल करने के ऑपरेशन्स के लिए मोरारजी देसाई ने रॉ को पचास लाख रुपये देने से मना कर दिया था। यही नहीं, पाकिस्तान के तानाशाह जिया-उल-हक को बातों-बातों में देसाई ने यह भी जानकारी दे दी कि भारत पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम के बारे में जानता है। तब पाकिस्तान का हूटा में रेडियम संवर्धन की कोशिश कर रहा है।

दरअसल, जिया-उल-हक लगातार देसाई से संपर्क में रहता था और देसाई की प्रसिद्ध ‘स्वमूत्र चिकित्सा’ का पाठ पढ़ता था। यह एक बुजुर्ग गांधीवादी नेता को शीशे में उतारने की उसकी कोशिश थी। जिया-उल-हक को जब पता चला कि भारत की खुफिया एजेंसी का हूटा संयंत्र के बारे में जान गयी है तो उसने एक बड़ा ऑपरेशन चलाकर तमाम रॉ एजेंटों को पकड़वाकर मरवा दिया। देसाई जिस जनता पार्टी के नेता बतौर प्रधानमंत्री थे, उसमें जनसंघ का विलय हुआ था। अटल बिहारी वाजपेयी इस सरकार में विदेश मंत्री और लाल कृष्ण आडवाणी सूचना एवं प्रसारण मंत्री थे।

ऊपर के दो पैराग्राफ में जो कुछ कहा गया है, उसमें कुछ कल्पना जोड़कर देसाई से लेकर वाजपेयी और आडवाणी तक को पाकिस्तान का एजेंट बताने वाली फिल्म बनायी जा सकती है। क्लाईमेक्स में यह भी दिखाया जा सकता है कि भारत से गद्दारी करने के लिए ही मोरारजी देसाई को पाकिस्तान ने अपना सर्वोच्च सम्मान निशान-ए-पाकिस्तान दिया था। ‘आदित्य धर स्टाइल’ के फिल्मकार के लिए ऐसी फिल्म बनाना बायें हाथ का खेल होगा। पाकिस्तान विरोध की तीव्रता की वजह से यह फिल्म बॉक्स ऑफिस में भी धमाल मचायेगी। ‘धुरंधर’ की तरह उस फिल्म में भी यह डिस्क्लेमर दे दिया जायेगा कि यह फिल्म काल्पनिक है और कुछ घटनाओं से प्रेरित भर है।

लेकिन हम जानते हैं कि यह सरासर बेईमानी होगी। न देसाई की देशभक्ति पर संदेह किया जा सकता है और न वाजपेयी और आडवाणी को पाकिस्तान परस्त बताया जा सकता है। फिल्म ‘धुरंधर’ मोदी और बीजेपी की वाहवाही में यही बेईमानी कर रही है।

इसलिए ‘धुरंधर’ भारत के संसदीय गणतंत्र पर हमला है! यह पाकिस्तान विरोध के रैपर में तानाशाही के समर्थन में जनमत तैयार कर रही है। फिल्म बताती है कि भाजपा छोड़ सभी दल भारत विरोधी ताकतों के पैसे पर पलते हैं। प्रकारांतर में यह बहुजनों की दावेदारी को देश विरोधी ताकतों का प्रोजेक्ट बता रही है। ‘सोशलिस्टों’ को आईएसआई के पैसे मिलने की बात कहकर यह फिल्म कांग्रेस और सपा जैसे दलों पर ही निशाना नहीं बनाती, बल्कि भगत सिंह से लेकर नेहरू, लोहिया और जयप्रकाश नारायण जैसी विभूतियों को भी अपमानित करती है जो ‘समाजवाद’ के लिए जिये और मरे। आदित्य धर भूल गया है कि समाजवाद भारतीय संविधान का संकल्प है! भाजपा के लोग भले ही इसे प्रस्तावना से हटाने की माँग करते हों!

फिल्म पीएम मोदी को दैवीय वरदान की तरह पेश करती है। यहाँ तक कि नोटबंदी जैसे फैसले को भी देश विरोधी ताकतों की कमर तोड़ने का फैसला बताती है जबकि इसने भारतीय अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी थी। 99.3% नोट बैंकों में वापस पहुँच गये थे! आम जनता महीनों परेशान रही थी। तब ताली बजाकर लोगों की परेशानी का मजाक उड़ाने वाले पीएम मोदी अब इसकी चर्चा भी नहीं करना चाहते जिसे दस साल बाद ‘धुरंधर’ उनका मास्टर स्ट्रोक बता रही है।

फिल्म सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के इरादे से यूपी में बीजेपी विरोधी दलों से विधायक रहे माफिया अतीक अहमद से मिलते-जुलते चरित्र को आईएसआई का प्यादा बताती है जबकि वाजपेयी सरकार के छह और मोदी सरकार के बारह सालों के दौरान किसी एजेंसी ने ऐसी रिपोर्ट नहीं दी थी। अतीक और उसके भाई की 2023 में पुलिस हिरासत में हत्या कर दी गयी थी। मोदी और शाह समेत पूरे सदन ने लोकसभा में अतीक अहमद को श्रद्धांजलि दी थी। क्या संसद में आईएसआई एजेंट को श्रद्धांजलि दी गयी थी? आदित्य धर यह सवाल करने की हिम्मत नहीं दिखा पाये।

फिल्म ‘धुरंधर’ में अतीक अहमद और उसके भाई की पुलिस हिरासत में की गयी हत्या को भारतीय खुफिया एजेंसियों का ऑपरेशन बताया गया है। हाल ही में अमेरिका के धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने ‘रॉ’ पर प्रतिबंध की माँग की है। ऐसे वक्त में रॉ का ऐसा चित्रण भारत के हितों के खिलाफ है। यह कूटनीतिक हाराकिरी है!

और यह संयोग नहीं है कि दाऊद इब्राहीम को ‘बड़े साहब’ बतौर मास्टरमाइंड बताने वाली इस फिल्म में एजेंसियों की नजर में दाउद इब्राहिम के शूटर रहे यूपी के मोस्ट वांटेड ब्रजेश सिंह की चर्चा भी नहीं है। क्या इसलिए कि उसके परिवार के कई लोग बीजेपी से विधायक रहे हैं! वह खुद भी कई मामलों में बरी होकर एमएलसी बना।

हकीकत तो यह भी है कि फिल्म में आईएसआई के पैसे पर पलने वाले विपक्षी नेता बतौर पेश किये गये अतीक अहमद को बीजेपी के वरिष्ठ नेता केशरीनाथ त्रिपाठी का लगातार कानूनी संरक्षण हासिल था जो इलाहाबाद के बड़े वकील थे। वे यूपी विधानसभा के कई सालों तक अध्यक्ष भी रहे। अतीक की हत्या के बाद इंडिया टुडे में छपे एक लेख में कहा गया था- ‘‘अतीक अहमद के केशरीनाथ त्रिपाठी से बहुत अच्छे संबंध थे. कई मौकों पर अतीक अहमद को गिरफ्तार होने से त्रिपाठी ने बचाया था। केशरीनाथ त्रिपाठी का निधन अतीक अहमद के लिए बड़ा झटका था। केशरीनाथ त्रिपाठी को अतीक अहमद कार गिफ्ट करते थे और कानूनी मदद भी मुहैया कराते थे। इलाहाबाद में एक लेखिका के घर में केशरीनाथ त्रिपाठी ने खुद कहा था कि उन्होंने कई मौकों पर अतीक अहमद को मारे जाने से बचाया है।’’

यह चिंता की बात है कि बीजेपी राज में ऐसी एजेंडा फिल्मों की भरमार हो गयी है जो आरएसएस और बीजेपी द्वारा व्हाट्सऐप में प्रचारित सामग्री को आधार मानकर कहानी बुनती हैं। नफरत और ध्रुवीकरण के लिए यह फिल्मों का वैसा ही प्रयोग है जैसा कभी हिटलर ने यहूदियों और अपने विरोधी दलों को निशाना बनाने के लिए किया था। लेकिन ‘धुरंधर’ एक अलग ही लेवल का फिनोमेना है। यह फिल्म बताती है कि जो बीजेपी के साथ नहीं है, वह देश के खिलाफ है। सभी विरोधी दल और सरकार से सवाल करने वाले आईएसआई के पैसे पर पल रहे हैं लेकिन मोदी जी इनके इरादों को बार-बार नाकाम करते जाते हैं। विपक्ष की सरकार मतलब पाकिस्तान-परस्त सरकार!

फिल्म में जो सीधे नहीं कहा जा रहा है, वह यह है- मोदी जी भारत को मिले दैवी वरदान हैं। वे हर सवाल से ऊपर हैं। क्या जरूरत है चुनाव की। मोदी जी को अनंत काल तक भारत के प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त कर देना चाहिए!

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