सुनील कुमार
विश्वरंजन Vishwaranjan का गुजर जाना बहुत से लोगों की जिंदगी से एक बड़ी अहमियत वाली हस्ती का गुजर जाना है। वे अविभाजित मध्यप्रदेश के आईपीएस रहे, बहुत लंबे वक्त तक भारत की प्रमुख खुफिया एजेंसी, आईबी के एक सबसे बड़े ओहदे पर रहे, और छत्तीसगढ़ का पुलिस प्रमुख बनकर उन्हें अनमने ढंग से लौटना पड़ा, क्योंकि उस वक्त के डीजीपी के अचानक गुजर जाने से दफ्तर खाली हो गया था, और छत्तीसगढ़ में उनसे अधिक माकूल कोई दूसरा अफसर मिल नहीं सकता था। इसलिए वे दशकों बाद छत्तीसगढ़ पुलिस में लौटे।
विश्वरंजन पुलिस के एक बड़े काबिल, और असाधारण व्यक्तित्व के धनी अफसर थे। साहित्य में उनकी गहरी दिलचस्पी और सक्रिय दखल, उन्हें पुलिस और सरकार से परे के एक अलग दायरे से जोडक़र रखते थे। वे पेंटिंग भी करते थे, कविता भी लिखते थे, और उनके साथ बरसों की दोस्ती में मैं उनकी इन दोनों खूबियों की भाषाओं से अनजान सुखी बना रहा। किसी कवि-दोस्त की कविता पढऩे का बोझ मुझ पर नहीं रहता, और मजदूर या क्रांतिकारी गीतों से अधिक कुछ समझ नहीं पड़ता, इसलिए मैं अपने कविता-निरक्षर होने की नुमाइश करने में नहीं हिचकता। विश्वरंजन के साथ शायद सैकड़ों बार घंटों-घंटों बैठने पर भी मैं उनकी कविताओं से बेदाग बचा रहा। दूसरी तरफ पेंटिंग के बारे में मेरी नासमझी पर उन्हें तरस भी आती थी, और वे कहते थे कि चित्रकला को पढऩे की एक अलग भाषा होती है, जो कि किस्सा-कहानी की भाषा से अलग रहती है।
लेकिन पुलिस-प्रमुख के उनके कामकाज से परे उनकी जो बात मुझे बांध लेती थी, वह किसी विश्वकोष जैसा उनका ज्ञान, उस ज्ञान के मतलब निकालने की उनकी अपार समक्ष, उसे बांटने की उनकी तत्परता, और इतनी ही तत्परता असहमति को सुनने की, और दूसरों से ज्ञान हासिल करने की। वे ज्ञान का एक ऐसा समंदर थे जो कि एक स्याहीसोख्ते की तरह प्यासे भी रहते थे, नए-नए लोगों से मिलने, और उनसे नई बातें जानने के लिए। यह एक बात उनमें और मुझमें एक सरीखी थी, लेकिन इससे परे की कुछ बातें एक दूसरे के ठीक खिलाफ भी थीं। वे एक चेन-स्मोकर थे, और बिना सिगरेट कम ही रहते थे। दूसरी तरफ मैं तम्बाकू का हिंसक हद तक विरोधी रहा, और विश्वरंजन की सिगरेट से अपनी हिकारत छुपाने की जहमत मैंने कभी नहीं उठाई। लेकिन घंटों साथ बैठना होता ही था, इसलिए हमने यह तय किया हुआ था कि बंद कमरे में वे कभी मेरी मौजूदगी में सिगरेट नहीं पिएंगे, और उनके दफ्तर से रात में जब हम रवाना होंगे, तो सामने के खुले मैदान पर टहलते हुए वे मुझसे कुछ दूरी पर चलते हुए एक सिगरेट पिएंगे, और मैं उसे बर्दाश्त करूंगा।
मेरे घर आकर ठहरने वाले एक विदेशी प्रोफेसर के साथ खाने पर जब-जब मैंने विश्वरंजन को आमंत्रित किया, तो दोनों चेन-स्मोकर घर के बाहर कॉलोनी की सडक़ पर पैदल घूमते हुए सिगरेट पीकर लौट आते थे, लेकिन नक्सल मोर्चे पर उस वक्त के सबसे बड़े पुलिस अफसर होने के नाते विश्वरंजन निशाने पर रहते थे, और उनकी अंगरक्षक टीम मुझसे इस बात पर फिक्र जाहिर करती थी कि साहब को सिगरेट पीने मेरे घर से बाहर जाना पड़ता है, खुले में, खतरे में। लेकिन यह रोक-टोक उनके रायपुर छोडऩे तक चलती रही। उनकी पत्नी यह बात मानती थीं कि मैं ही अकेला उन्हें कुछ समय के लिए सिगरेट से रोकता हूं, जो कि मेरे चले जाने के बाद फिर शुरू हो जाती है।
विश्वरंजन देश और दुनिया के एक मशहूर शायर फिराक गोरखपुरी के नाती थे। इस नाते उनकी बड़ी संपन्न और समृद्ध यादें थीं, और वे खुले खयालों के थे, इसलिए मैं उनसे इस बात की चर्चा भी कर लेता था कि फिराक को लेकर यह बात उठती रहती है कि उनके समलैंगिक संबंध भी थे। वे ऐसे विवादों से नावाकिफ नहीं थे, और न ही यह मानते थे कि फिराक के जिंदगी के किसी पहलू को बातचीत से परे रखना चाहिए। साहित्य में विश्वरंजन की दखल मेरे किसी काम की थी नहीं, फिर भी वे मुझे अपने संपादन वाली कुछ किताबें भेंट करते रहते थे, जो कि बिना पढ़े अभी भी मेरे पास सुरक्षित हैं। वे इतने करीबी दोस्त थे कि इन किताबों को लेने से मना करके मैं उनका दिल नहीं तोड़ सकता था, लेकिन बाकी कवि-साहित्यकारों को मैं विनम्रता से मना करके किसी सुपात्र को उनकी किताब भेंट करने की सलाह दे देता हूं।
छत्तीसगढ़ पुलिस में उनके पहले और उनके बाद बरसों तक वैसा कोई काबिल प्रमुख आया नहीं, और वे काबिलीयत में एक अपवाद सरीखे थे। सत्तारूढ़ नेताओं की राजनीतिक पसंद-नापसंद का अपमान किए बिना उसे खारिज कर देने का हौसला उन्हें आईबी में सबसे ऊपर के दो-चार अफसरों में रहते हुए मिल चुका था, और वे छोटी-छोटी राजनीतिक ताकतों को चर्चा के लायक भी नहीं मानते थे। मैंने उनके साथ घंटों चलने वाली बैठकों में कई बार देखा कि किसी तबादले के लिए, या किसी दूसरे काम के लिए सत्ता की सबसे ऊंचाई से भी फोन आने पर वे मना करना जानते थे। विनम्र रहते थे, लेकिन साफ-साफ मना कर देना उनके मिजाज में था।
अमरीका के विख्यात उदारवादी और वामपंथी सोच के विश्वविद्यालय, कैलिफोर्निया के बर्कले ने जब भारतीय लोकतंत्र पर एक सेमीनार किया, तो वामपंथी उग्रवाद पर केन्द्रित एक सत्र में उन्होंने विश्वरंजन और मुझे, दोनों को बोलने के लिए आमंत्रित किया। जब हम वहां पहुंचे, तो सभागृह के बाहर बरामदों में, लिफ्ट में, पुरूष शौचालय के भीतर, हर जगह विश्वरंजन की मुंह से लहू टपकती हुई, ड्रैकुला जैसी तस्वीर बनाकर उस पर नारे छपे थे- वॉर क्रिमिनल विश्वरंजन गो-बैक। उनके कार्यकाल में नक्सलियों के खिलाफ बड़ी मुहिम चलती रही, राज्य के भाजपाई मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह, और केन्द्र की मनमोहन सिंह सरकार के बीच नक्सल मोर्चे को लेकर कोई मतभेद नहीं था। इसलिए दोनों की मिलीजुली कार्रवाई से बस्तर में नक्सलियों के सफाए की बड़ी मुहिम चलती थी, और उसमें विश्वरंजन की खासी बदनामी भी होती थी, क्योंकि मानवाधिकार हनन के कई मामले आते थे। ऐसी ही बदनामी के चलते विश्वरंजन के खिलाफ बर्कले विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने सभागृह के भीतर इतनी लंबी नारेबाजी की थी, और उन्हें सुनने के लिए वे किसी तरह तैयार ही नहीं थे। मंच पर पैनल में बैठे हुए मुझे यह लग रहा था कि अगले तीन दिन इसी शहर में इन हजारों छात्र-छात्राओं के बीच विश्वरंजन के साथ घूमते हुए मैं भी सुरक्षित बचूंगा या नहीं? लेकिन वे अपने आम बर्दाश्त के साथ बैठे रहे, और जब बोलने का मौका आया तो उन्होंने पुलिस और सरकार का पक्ष रखा, केन्द्र और राज्य सरकार, दोनों का।
मैंने उनके डीजीपी बनते ही उनसे एक इंटरव्यू के लिए समय मांगा था, और अपनी फिल्म प्रोडक्शन टीम के साथ जाकर उनके दफ्तर को भीतर से बंद करके, फोन बंद करवाकर इंटरव्यू रिकॉर्ड किया, तो वह शायद तीन साढ़े तीन घंटे चला। देश में वामपंथी उग्रवाद के इतिहास से लेकर वर्तमान तक की चर्चा करने वाला वह एक अनोखा इंटरव्यू था जो अखबार के पन्नों पर शायद तीन पन्ने छपा था, और फिर नक्सलियों ने उसका एक अखबारी-पन्ने जितना लंबा जवाब भी लिखकर भेजा था। पूरे का पूरा जवाब छापने पर विश्वरंजन ने कहा कि नक्सलियों ने उन पर कुछ नए आरोप भी लगाए हैं, और अखबार को विश्वरंजन को इनका जवाब देने का मौका देना चाहिए। यह जवाब भी एक पूरे पन्ने जितना था। नतीजा यह हुआ कि नक्सलियों और डीजीपी के बीच के इस अघोषित और अनौपचारिक संवाद पर इंडियन एक्सप्रेस ने पहले पेज पर एक रिपोर्ट बनाई, और एनडीटीवी ने उसके बाद अपने प्राइम टाइम बुलेटिन में इसे कवर करने दिल्ली से एक टीम हमारे अखबार भेजी। इसी इंटरव्यू की शोहरत के चलते हम दोनों को बर्कले में बुलाया गया था।
छत्तीसगढ़ में नक्सलियों को सहयोग देने के आरोप में एक शोध-सहायक, और वीडियोग्राफर अजय टी.जी. को गिरफ्तार किया गया था। विश्वरंजन उस वक्त डीजीपी थे। लंदन स्कूल ऑफ इकानॉमिक्स के प्रोफेसर जोनाथन पैरी मेरे मेहमान थे, और छत्तीसगढ़ में उनके फील्ड वर्क में अजय उनके सहायक थे। भिलाई आने पर वे अजय के घर पर रूकते थे। गिरफ्तारी से वे विचलित थे। उन्होंने खाने पर मेरे घर पर विश्वरंजन से जब चर्चा की, तो अगले दिन विश्वरंजन दुर्ग जेल में जाकर अजय से मिले, उसकी बात सुनी। रिहाई तो नहीं हुई क्योंकि उन्होंने केस में दखल नहीं दिया, लेकिन अजय जेल में रहते हुए कुछ अच्छी किताबें पढऩा चाहते थे, तो विश्वरंजन ने अपनी निजी लाइब्रेरी से कई किताबें अजय के लिए जेल भेजीं। डीजीपी किसी विचाराधीन कैदी को किताबें भेजे, ऐसा विश्वरंजन के साथ ही हो सकता था।
मेरे साथ विश्वरंजन असाधारण उदार थे। उम्र में शायद खासा फासला रहा हो, लेकिन दोस्ताना हमेशा ही रहा। रिटायर होने के बाद जब छत्तीसगढ़ पुलिस के उस वक्त के अफसरों ने साधारण शिष्टाचार निभाना भी बंद कर दिया, तो विश्वरंजन ने पटना जाकर बसना तय किया, जहां उनके बेटी-दामाद भी थे, और पत्नी के दूसरे रिश्तेदार भी शायद वहीं थे। उन्होंने मुझे बुलाकर यह बुरी खबर सुनाई, और साथ ही कहा कि मैं उनकी विशाल निजी लाइब्रेरी से जितनी किताबें चाहूं, ले जाऊं। उन्होंने यह भी कहा कि मैं किताबें रखने की आलमारियां भी ले जाऊं, ताकि मुझे कोई असुविधा न हो। मैंने उन्हें साहित्य, दर्शन, और इतिहास की किताबें छोडक़र बाकी किताबों में से अखबारी जरूरत की कुछ चुनिंदा किताबें छांट देने को कहा, और यह भी कहा कि किसी एक विषय पर एक से अधिक किताब मुझे नहीं चाहिए। अगले कई हफ्ते वे हमारे तय किए हुए ऐसे दर्जनों विषयों पर उनकी समझ की सबसे अच्छी एक-दो किताबें छांटते रहे, और हर कुछ दिनों में मैं जाकर कार भरकर किताबें लाते रहा। उनकी दी हुई किताबों से आज भी मेरे दफ्तर का कमरा लोगों में यह गलतफहमी पैदा करता है कि मैं खासा पढ़ा-लिखा हूं।
विश्वरंजन दशकों से कई तरह की बीमारियों से घिरे हुए थे, और वे जाने वाली तकलीफें नहीं थीं। पिछले कई हफ्ते पटना के बड़े अस्पतालों में वे वेंटिलेटर पर रहे, और अब देह की अधिक दुर्गति के बिना उनका चले जाना मुझे राहत की बात लगती है, क्योंकि उनकी तबियत ठीक होने के आसार थे नहीं।
पुलिस जैसी नाजुक साख वाले विभाग में विश्वरंजन एक असाधारण साख के अफसर थे, साहित्य, और बाकी कलाओं के बड़े रसिक, और मर्मज्ञ थे, वे अपने नाम के अनुरूप ज्ञान के विश्वकोष सरीखे थे, और ठीक-ठाक उम्र जीकर गुजर गए।
दशकों पहले उनका भेजा एक कार्ड मुझे मिला था, जिस पर गिने-चुने शब्द छपे हुए थे- आज सहसा आपकी याद आई।-विश्वरंजन।
ऐसी अनौपचारिक याद के लिए भी वे एक औपचारिक कार्ड भेजते थे, और मेरे संपर्क में ऐसे वे अकेले व्यक्ति थे।
आज मैं सोचूं भी कि उन्हें ऐसा एक कार्ड भेजूं, तो कहां भेजूं? अभी से चार घंटों में वे पंचतत्व में विलीन हो चुके रहेंगे, तो पांच अलग-अलग कार्ड भेजने होंगे?


