ईरान युद्ध से पूरी दुनिया में पैदा हो सकता है खाद्य संकट

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ईरान युद्ध से पूरी दुनिया में पैदा हो सकता है खाद्य संकट


14-Mar-2026 9:05 PM

ईरान के साथ चल रहे तनाव के चलते ऊर्जा और खाद की कीमतें बढ़ रही हैं. खाने पीने की चीजों में फिर से महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है. किसानों को डर है कि संसाधनों की कमी के कारण इस साल पैदावार में भारी गिरावट आ सकती है.

 डॉयचे वैले पर निक मार्टिन का लिखा-

ईरान युद्ध की वजह से होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) से गायब होते तेल और एलएनजी टैंकरों पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं. आखिर ऐसा हो भी क्यों न, ईरान और ओमान के बीच मौजूद इस संकरे समुद्री रास्ते से दुनिया का लगभग 20 फीसदी कच्चा तेल और एलएनजी गुजरता है. यह तेल और गैस खाड़ी देशों से पूरी दुनिया को भेजा जाता है.

हालांकि, असली संकट उन जहाजों को लेकर है जिनमें दुनिया भर में खेती के लिए जरूरी खाद और खाड़ी देशों के लिए भोजन भरा होता है. संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, ओमान, बहरीन और सऊदी अरब जैसे खाड़ी देशों के लिए यह समुद्री रास्ता जीवन रेखा है. इसके बंद होने का मतलब है कि इन रेगिस्तानी देशों में खाने-पीने की चीजें खत्म हो सकती हैं.

मैरीटाइम इंटेलिजेंस कंपनी ‘सिग्नल ग्रुप’ के आंकड़ों से पता चलता है कि दुनिया भर में व्यापार होने वाली प्रमुख खादों, जैसे कि अमोनिया, फॉस्फेट और सल्फर का 20 फीसदी हिस्सा अकेले खाड़ी देशों से आता है.

ब्लूमबर्ग इंटेलिजेंस के मुताबिक, दुनिया भर में व्यापार होने वाले यूरिया, जो सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली नाइट्रोजन खाद है, का लगभग आधा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आता है. इसमें से अकेले कतर पूरी दुनिया की सप्लाई के 10 फीसदी हिस्से का उत्पादन करता है.

जब पिछले हफ्ते ईरान ने दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी और फर्टिलाइजर हब ‘रास लफ्फान’ पर हमला किया था, तो कतर एनर्जी को अपना उत्पादन रोकना पड़ा. इस वजह से लाखों टन जरूरी फर्टिलाइजर न्यूट्रिएंट्स और उन्हें बनाने वाले कच्चे माल (प्रिकर्सर्स) जहां के तहां रुक गए.

ईरान युद्ध के बढ़ते असर से, पिछले छह साल में दुनिया की खाद्य सुरक्षा के लिए तीसरा सबसे बड़ा खतरा पैदा हो गया है. इससे पहले पूरी दुनिया कोविड-19 महामारी और फिर 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध का सामना कर चुकी है. उस समय रूस ने यूक्रेन के उन खेतों और बंदरगाहों पर कब्जा कर लिया था जहां से अनाज का निर्यात होता था.

जब से ईरान युद्ध शुरू हुआ है, खाद की कीमतें 10 से 30 फीसदी तक बढ़ गई हैं. हालांकि, वे अभी भी रूसी टैंकों के यूक्रेन में घुसने के बाद के हफ्तों की तुलना में लगभग 40 फीसदी कम हैं.

फसल की पैदावार पर पड़ सकता है असर

विकासशील देशों की मदद करने वाली संयुक्त राष्ट्र की संस्था ‘यूएनसीटीएडी’ के मुताबिक, हर महीने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते लगभग 13.3 लाख टन खाद का निर्यात किया जाता है. इसलिए, अगर यह समुद्री रास्ता सिर्फ 30 दिनों के लिए भी बंद हो जाए, तो दुनिया भर में खाद की किल्लत पैदा हो सकती है. इससे मक्का, गेहूं और चावल जैसी फसलों की पैदावार गिरने का बड़ा खतरा पैदा हो जाएगा, क्योंकि ये फसलें पूरी तरह से नाइट्रोजन (यूरिया) पर निर्भर होती हैं.

वॉशिंगटन में मौजूद ‘इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट’ (आईएफपीआरआई) के सीनियर रिसर्च फेलो जोसेफ ग्लॉबर ने डीडब्ल्यू को बताया, “खाद की बढ़ी हुई कीमतें इस बात पर असर डालेंगी कि किसान कौन सी फसल उगाना चाहते हैं. खेती की लागत को बढ़ने से बचाने के लिए, किसान उन फसलों को चुन सकते हैं जिन्हें कम खाद की जरूरत होती है, बजाय उन फसलों के जिनमें बहुत ज्यादा नाइट्रोजन की जरूरत पड़ती है.”

ग्लॉबर ने आगे कहा, “खाद की कीमतें बढ़ने से गरीब देशों के किसान उसे खरीद नहीं पाएंगे और मजबूरी में कम खाद का उपयोग करेंगे. अगर वे ऐसा करते हैं, तो इससे फसलों की पैदावार को भारी नुकसान पहुंच सकता है.”

इस हफ्ते अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने कहा कि ईरान युद्ध ‘लगभग खत्म हो गया है.’ इसके बावजूद, यूनाइटेड किंगडम के मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस (यूकेएमटीओ) का कहना है कि ईरान ने बुधवार को होर्मुज में या उसके पास कम से कम तीन जहाजों पर फायरिंग की. यह इस बात का संकेत है कि तेहरान इस समुद्री रास्ते को लगभग बंद रखने पर अड़ा हुआ है.

गुरुवार तड़के खाड़ी क्षेत्र में और भी हमलों की खबरें मिली हैं. इनमें एक मालवाहक जहाज और कई तेल टैंकरों को निशाना बनाए जाने की खबर है.

कमोडिटी एक्सपर्ट का कहना है कि होर्मुज का रास्ता व्यापारिक जहाजों के लिए जितने लंबे समय तक बंद रहेगा, खाद की वैश्विक आपूर्ति उतनी ही ज्यादा ठप होने लगेगी.

डच बैंक ‘आईएनजी’ ने इस महीने की शुरुआत में एक रिसर्च नोट में चेतावनी दी थी, “अगर आपूर्ति में रुकावट लंबे समय तक जारी रहती है, तो भारत, ब्राजील, दक्षिण एशिया और यूरोपीय संघ के कुछ हिस्सों में खाद की उपलब्धता काफी कम हो जाएगी. ये देश और इलाके मुख्य रूप से खाद के आयात पर निर्भर हैं.”

रूस, चीन, अमेरिका और मोरक्को जैसे अन्य खाद उत्पादकों के पास अतिरिक्त उत्पादन क्षमता बहुत कम है. इसलिए, वे इस कमी को पूरा करने के लिए तुरंत उत्पादन नहीं बढ़ा पाएंगे. चीन ने फॉस्फेट और नाइट्रोजन खादों के निर्यात पर पाबंदी लगा रखी है, लेकिन अब उसे ये पाबंदियां हटाने के लिए दबाव का सामना करना पड़ सकता है.

यूएस डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर के पूर्व वरिष्ठ अर्थशास्त्री ग्लॉबर ने कहा, “पोटाश या फॉस्फेट के विपरीत, नाइट्रोजन का उत्पादन कहीं भी किया जा सकता है जहां प्राकृतिक गैस या कोयला उपलब्ध हो. पोटाश और फॉस्फेट के लिए तो आपको उन खनिजों की खदानों पर निर्भर रहना पड़ता है. लेकिन असली समस्या प्राकृतिक गैस की ऊंची कीमतें हैं, जिसकी वजह से नाइट्रोजन का उत्पादन बढ़ाना घाटे का सौदा साबित हो सकता है.”

 

तेल की बढ़ती कीमतों से खाने की कीमतें बढ़ेंगी

खाद की कमी के अलावा, भोजन की कीमतों को तय करने में तेल की सबसे बड़ी भूमिका होती है. तेल से ही खेत की मशीनों और फसलों को ढोने वाले ट्रकों को चलाया जाता है. इसके अलावा, फसलों को खाने योग्य बनाने वाले प्रोसेसिंग प्लांट और कोल्ड स्टोरेज से ऊर्जा मिलती है. अब भोजन के उत्पादन से जुड़ा हर चरण ऊर्जा की बढ़ती कीमतों के खतरे की चपेट में है.

ब्रेंट क्रूड (कच्चा तेल) की कीमतें 119.50 डॉलर तक जाने के बाद अब 89 डॉलर के ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं. इसका असर पेट्रोल पंपों पर साफ दिख रहा है. पिछले दो हफ्तों में अमेरिका के पश्चिमी तट पर डीजल की कीमतें 14 फीसदी बढ़कर 4.69 डॉलर प्रति गैलन पहुंच गई हैं, जबकि जर्मनी में डीजल की कीमत 2.10 यूरो प्रति लीटर को पार कर गई है. जो महज कुछ ही दिनों में 20 फीसदी की बढ़ोतरी है.

चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसी एशियाई अर्थव्यवस्थाएं, जो अपनी जरूरत का ज्यादातर तेल खाड़ी देशों से मंगाती हैं, वहां भी ईंधन की कीमतों में भारी उछाल देखा जा रहा है. दूसरी ओर, भारत सरकार ने डीजल और पेट्रोल की कीमतों को फिलहाल न बढ़ाने का फैसला किया है, ताकि आम जनता और व्यापारिक परिवहन को बढ़ती महंगाई से बचाया जा सके.

आईएमएफ की प्रमुख क्रिस्टालिना जोर्जिएवा ने पिछले हफ्ते ब्लूमबर्ग को दिए एक इंटरव्यू में चेतावनी दी, “अगर ऊर्जा (तेल और गैस) की कीमतों में 10 फीसदी की बढ़ोतरी एक साल तक बनी रहती है, तो इससे वैश्विक महंगाई 0.4 फीसदी तक बढ़ सकती है और दुनिया की आर्थिक विकास दर में 0.2 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है.

आईएफपीआरआई के ग्लॉबर ने डीडब्ल्यू को बताया, “भोजन की कुल लागत में ऊर्जा का अप्रत्यक्ष हिस्सा लगभग 50 फीसदी होता है. 2023-24 में अधिकांश देशों में खाद्य महंगाई की दर बहुत ऊंची रही, उसके बाद कीमतें कम नहीं हुई हैं. बस उनके बढ़ने की रफ्तार थोड़ी धीमी हुई है.”

आयात पर निर्भर देशों को सबसे ज्यादा नुकसान

ईरान युद्ध की मानवीय कीमत दुनिया भर में एक समान नहीं होगी. इसका सबसे बुरा असर उन गरीब देशों पर पड़ेगा जो अपनी जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं. खाद की भारी कमी और आसमान छूती बिजली-तेल की कीमतें इन कमजोर देशों की कमर तोड़ देंगी.

भारत पर इस संकट का गंभीर असर हो सकता है, क्योंकि यह अपनी जरूरत की दो-तिहाई नाइट्रोजन खाद के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर है. इसमें यूरिया का एक बड़ा हिस्सा शामिल है. खाद की कमी आने वाले मानसून में बुवाई पर असर डाल सकती है, जिससे चावल, गेहूं और अन्य मुख्य अनाजों की खेती की लागत बहुत बढ़ जाएगी. इससे 145 करोड़ लोगों के भोजन के लिए बड़ा संकट खड़ा हो सकता है.

ब्राजील दुनिया को सबसे ज्यादा कृषि उत्पाद भेजने वाले देशों में से एक है, लेकिन यह भी अपनी जरूरत की लगभग 40 फीसदी नाइट्रोजन (यूरिया) के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर है. अगर आपूर्ति में लंबे समय तक रुकावट आती है, तो इससे वहां सोयाबीन और मक्के की पैदावार पर बड़ा खतरा मंडराएगा और वह भी ऐसे समय में जब वैश्विक आपूर्ति शृंखला पहले से ही दबाव में है.

लंबे समय के नजरिए से देखें, तो यह संकट उप-सहारा अफ्रीका के लिए सबसे बड़ा खतरा है. कई अफ्रीकी देश पहले से ही जरूरत से बहुत कम खाद का इस्तेमाल करते हैं. ऐसे में, खाद की कीमतों में थोड़ी सी भी बढ़ोतरी वहां के छोटे किसानों को इसका इस्तेमाल और भी कम करने पर मजबूर कर सकती है. इससे फसलों की पैदावार गिर जाएगी और वहां पहले से मौजूद भुखमरी की समस्या और भी गहरी हो जाएगी.

ब्लूमबर्ग के मुताबिक, ईरान में युद्ध शुरू होने से पहले ही महंगाई 40 फीसदी से ज्यादा थी. खाने-पीने की चीजों के दाम तो इससे भी कहीं तेजी से बढ़ रहे थे. अब आयात में रुकावट, बढ़ती ऊर्जा लागत और देश के भीतर सप्लाई चेन की समस्याओं के कारण खाद्य महंगाई और भी बढ़ सकती है, जिससे करोड़ों लोगों की मुश्किलें और बढ़ जाएंगी.

खाड़ी देश अपनी जरूरत का 80 से 90 फीसदी भोजन आयात करते हैं. इनमें अनाज और मांस से लेकर डेयरी उत्पाद और खाद्य तेल तक शामिल हैं. वे इन शिपमेंट्स के लिए पूरी तरह होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भर हैं. अगर यह रास्ता लंबे समय तक बंद रहता है, तो उनके सुरक्षित भंडार कुछ ही महीनों में खत्म हो सकते हैं. ऐसी स्थिति में उन्हें राशनिंग (कोटा सिस्टम) लागू करने या लाल सागर और ओमान की खाड़ी के जरिए बहुत महंगे वैकल्पिक रास्तों का इस्तेमाल करने पर मजबूर होना पड़ेगा. (dw.com/hi)



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