होलिका दहन से लेकर रंगों की मस्ती तक, बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है होली
Holi Festival: आखिर क्यों मनाई जाती है होली? जानिए रंगों के इस पर्व की पौराणिक और ऐतिहासिक कहानीहोली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।
हर साल फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व पौराणिक कथा से जुड़ा है। मान्यता है कि प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नामक असुर राजा ने अपने पुत्र प्रह्लाद को भगवान विष्णु की भक्ति से रोकने की कोशिश की, लेकिन जब वह असफल रहा तो उसने अपनी बहन होलिका की मदद से प्रह्लाद को अग्नि में जलाने की योजना बनाई।

होलिका को वरदान था कि अग्नि उसे नहीं जला सकती, लेकिन भगवान की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका अग्नि में भस्म हो गई। इसी घटना की स्मृति में होलिका दहन किया जाता है, जो बुराई के अंत और सत्य की विजय का संदेश देता है।
ऐतिहासिक रूप से भी होली का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों और मंदिरों की शिलालेखों में मिलता है। ब्रज क्षेत्र में यह पर्व विशेष उल्लास के साथ मनाया जाता है, जहां इसे भगवान कृष्ण और राधा की रासलीला से जोड़ा जाता है। माना जाता है कि कृष्ण ने राधा और गोपियों के साथ रंग खेलकर इस परंपरा की शुरुआत की थी।
होली सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। यह पर्व लोगों को आपसी मतभेद भुलाकर गले मिलने, प्रेम और भाईचारे का संदेश देने का अवसर देता है। ग्रामीण भारत में नई फसल की खुशी भी इसी समय मनाई जाती है, इसलिए इसे बसंत और समृद्धि का उत्सव भी कहा जाता है।
आज होली भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों में उत्साह से मनाई जाती है। रंगों की यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि जीवन में खुशियों के रंग भरना और नकारात्मकता को जलाना ही इस पर्व का असली संदेश है।


